साक्षी भाव क्या है?

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admin Staff answered 2 months ago

‘साक्षी भाव’ (witnessing) एक उलझन भरा शब्द हो सकता है।
कोई सोच सकता है कि साक्षी भाव का मतलब दुनिया या संसार को देखना है।
यह सच नहीं है।
साक्षी भाव असल में देखने की क्षमता है; किसी में देखने की जो काबिलियत होती है, वही चेतना (consciousness) है।
लेकिन फिर कोई कह सकता है, “मैं देख सकता हूँ।” “मैं दुनिया को देख रहा हूँ।”
इनमें क्या फ़र्क है?
प्रिया ने जवाब दिया –
एक तो अपनी इंद्रियों के ज़रिए दुनिया को देखना है, जबकि दूसरा इंद्रियों से परे है। यह इंद्रियों और प्रकृति (अष्टधा प्रकृति) को भी देख सकता है।
सही।
हम कुछ भी नहीं हैं।
हमें लगता है कि हम देख रहे हैं, लेकिन हमारे भीतर चेतना के बिना, न तो हम देख पाते और न ही यह सोच पाते कि हम देख रहे हैं।
इसका सबूत ‘सोचने वाले’ को देखने में है: जिसे ‘साक्षी’ कहा जाता है, उसे देखा जा सकता है, लेकिन ‘जागरूकता’ (awareness) को नहीं।
यह चाँदनी की तरह है; चाँदनी एक ही है, लेकिन जब वह कई झीलों और महासागरों पर पड़ती है, तो वे सभी मानते हैं कि रोशनी उनकी अपनी है, जबकि असल में रोशनी सिर्फ़ एक ही है। जिस पल चाँदनी गायब होती है, उनकी उधार ली हुई रोशनी भी गायब हो जाती है।
जागरूकता वह रोशनी है जो किसी भी तरह के दोहरेपन (duality) को नहीं जानती; यह हमारी इंद्रियों, मन, विचारों और हर चीज़ को रोशन करती है; वे सभी इसमें नहा रहे होते हैं।
और हमारे विचारों में से एक है “मैं”; मैं और मेरा, जो हमें दूसरों से अलग करते हैं।
यह हम सभी के लिए दोहरेपन की दुनिया बनाता है, जिससे हमें दुख होता है।
जागरूकता को परम सत्य और खुद को ‘अस्तित्वहीन’ (non-existent) मानने से हमारे दुख खत्म हो जाते हैं।
ज़िंदगी बस चल रही है; इसे चलने दें, इसकी अच्छाइयों को सराहें, अहंकार को ज़हर समझें और उससे दूर रहें।
अहंकार से ऊपर उठने का तरीका जागरूकता में जीना है; जागरूकता के प्रति जागरूक रहें, और अहंकार कम होने लगता है।