माया (जो अवास्तविक को वास्तविक और वास्तविक को अवास्तविक मानती है) एक भ्रम है, और भ्रम एक विश्वास है।
सभी विश्वास मन में ही रहते हैं।
इसलिए, केवल मन से ऊपर उठकर ही आप माया पर विजय पा सकते हैं।
और मन से परे की सर्वोच्च अवस्था ‘शून्य अवस्था’ है – यानी मौन।
मौन बहुत गहरा और अत्यंत रहस्यमय होता है।
केवल मौन में ही यह शक्ति है कि वह माया के जटिल रहस्य को आत्मसात कर सके और फिर भी व्यक्ति अपना दैनिक जीवन जी सके।
माया एक रोग है, और मौन उसका उपचार है।
आंतरिक मौन, जिसे ‘शून्यता’ कहते हैं, एक ऐसा आयाम है जहाँ विचारों का कोई “शोर” नहीं होता।
और इसमें माया पर विजय पाने की शक्ति होती है।
पेड़ को देखने के हमारे उदाहरण में, हमने यह समझा कि हमारे और पेड़ के बीच का खाली स्थान (space) अत्यंत महत्वपूर्ण है और वह अनंत से जुड़ा हुआ है।
लेकिन यह तो भौतिकी (Physics) की बात है।
हमारा मन इसे आसानी से समझ सकता है।
तो फिर शून्य अवस्था की आवश्यकता क्यों है?
शून्य अवस्था में ऐसा कौन-सा जादू छिपा है?
शून्य अवस्था में विचारों का कोई शोर नहीं होता। शून्य अवस्था का अनुभव भी किया जाता है। अनुभव कौन करता है? इसका अनुभव ‘जागरूकता’ (Awareness) द्वारा किया जाता है। इसलिए, जागरूकता वहाँ अब भी मौजूद रहती है। चूँकि वहाँ कोई अन्य शोर नहीं होता, इसलिए जागरूकता का अनुभव करना अधिक आसान हो जाता है।
इस जागरूकता का अनुभव कौन करता है?
जब हम भौतिकी की बात करते हैं, तो यह मन का खेल होता है; लेकिन जब हम ध्यान करते हैं, तो यह सब कुछ जागरूकता पर आधारित होता है।
वह जागरूकता तब भी मौजूद थी, जब हम पेड़ को देख रहे थे; लेकिन हम ‘मैं’ और ‘पेड़’ में ही खोए हुए थे, और उस समय अपनी ही जागरूकता से अनजान थे।
इसलिए, शून्य अवस्था में कुछ भी शेष नहीं रहता; फिर भी कुछ ऐसा शेष रह जाता है जो आपके मन से परे है – और वही आपका ‘सच्चा स्वरूप’ है।
आप तब भी वहाँ मौजूद थे, जब आपका शरीर और मन उस पेड़ को देख रहे थे।
वह अनुभव हुआ और बीत गया (और आप अगले अनुभव की ओर बढ़ गए), लेकिन जागरूकता सदैव बनी रहती है।
वह केवल देखती रहती है।
मन और शरीर का यह संयुक्त रूप (mind-body complex) जिस भी अनुभव से गुज़रता है, जागरूकता केवल उसकी साक्षी बनती है।
अनुभव अनेक होते हैं; वे निरंतर बदलते रहते हैं, लेकिन जागरूकता कभी नहीं बदलती।
ठीक वैसे ही, जैसे स्टेशन आते हैं और चले जाते हैं; लेकिन ट्रेन में बैठा हुआ ‘आप’ उन स्टेशनों में नहीं बदल जाते – आप वे स्टेशन नहीं हैं।
मन और शरीर का यह संयुक्त रूप (mind-body complex) तो बस एक स्टेशन है; यह ‘आप’ नहीं हैं।
जागरूकता केवल एक ही है, और ‘आप’ वही जागरूकता हैं।