भले ही हम इसे चेतना, जागरूकता आदि कहते रहें, लेकिन ‘परम सत्ता’ (Absolute) इससे कहीं ज़्यादा है।
चेतना (चित्त) तो बस इसका एक गुण मात्र है।
इसे पूरी तरह से समझाने के लिए ‘सत्-चित्-आनंद’ शब्द भी कम पड़ जाते हैं।
केवल एक ही “चीज़” है जो इसे सचमुच अच्छी तरह से बयां कर सकती है—वह है ‘परम मौन’।
यह एक ऐसी बिना शर्त स्वीकृति है, जिसे शब्दों में बयां करना असंभव है।
‘चेतना’ शब्द इसे समझाने के लिए इसलिए सही लगता है, क्योंकि हम सभी चेतन हैं—और इसी वजह से हम इसे समझ पाते हैं।
“100 साल पहले आप चेतना का क्या करते? तब तो आपके पास अपना शरीर भी नहीं था—संसार की बाकी चीज़ों के प्रति चेतन होने की बात तो दूर रही?”
— निसर्गदत्त, एक साधक से संवाद करते हुए।
चेतना के प्रकट होने से भी पहले, ‘परम सत्ता’ का अस्तित्व था।
संसार के सभी महान संत अंततः उसी एक बिंदु पर आकर विलीन हो जाते हैं।
“जिस ‘ताओ’ (Tao) को शब्दों में बयां किया जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है।”
— लाओ त्से
इसे परिभाषित करने से इसका दायरा सीमित हो जाता है और इसकी सुंदरता नष्ट हो जाती है; केवल ‘मौन’ ही इसके साथ सच्चा न्याय कर सकता है।
अपनी अंतर्यात्रा तब तक जारी रखें, जब तक आप पूरी तरह से निशब्द न हो जाएं।
शंकराचार्य ‘दक्षिणामूर्ति स्तोत्र’ में कहते हैं—
मौनं व्याख्या प्रकटितं परब्रह्म तत्त्वम्
परम ब्रह्म का साक्षात्कार (रहस्योद्घाटन) ‘मौन’ के माध्यम से ही होता है।
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