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सच कहाँ है?

जब भी आत्म-ज्ञान होता है, वह हमेशा वर्तमान में ही होता है।
वर्तमान और उपस्थिति में क्या अंतर है?
जब कोई कहता है “वर्तमान”, तो इसका मतलब है “मैं उपस्थित हूँ” या “अमुक व्यक्ति उपस्थित है”।
“वर्तमान” किसी व्यक्ति या चीज़ को बताता है और उसकी ओर इशारा करता है।
यह खास होता है; इसका एक रूप होता है।
दूसरी ओर, उपस्थिति अमूर्त, निराकार होती है।
यह किसी खास व्यक्ति से जुड़ी नहीं होती।
यह बिना किसी विशिष्टता के, उपस्थिति, अस्तित्व की ही एक पहचान और स्वीकृति है।
क्योंकि यह विशिष्ट नहीं है, इसलिए यह सामान्य, निराकार है, और इसीलिए अनंत है।
मन के दखल के कारण शुरुआत में इसे समझना मुश्किल हो सकता है, लेकिन कोई इसे नकार भी नहीं सकता।
पूरा आध्यात्मिक मार्ग रूपों की दुनिया (संसार) से अलग, इसी की पहचान में निहित है।
अस्तित्व की जागरूकता का अभ्यास धीरे-धीरे व्यक्ति को एक ऐसे उच्च आयाम में ले जाता है, जिसका अनुभव पहले कभी नहीं किया गया।
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