No Video Available
No Audio Available
संन्यास
संसार में सब कुछ व्यापार है।
कोई इच्छा करता है, कोई उसे पूरा करता है, और लेन-देन होता है – यानी व्यापार हो गया।
आप क्या चाहते हैं, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
चाहे आपको पैसा, सुंदरता, नाम, शोहरत, व्यूअरशिप (सोशल मीडिया पर), दोस्त या रिश्तेदार चाहिए हों – इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
चाहना या इच्छा करना ही संसार है।
लेकिन ध्यान इससे अलग है।
ध्यान सिर्फ़ उनके लिए है जिन्होंने संसार की ऐसी चीज़ों की निरर्थकता को समझ लिया है।
ध्यान एक बदलाव है; एक संसारी से संन्यासी बनने का बदलाव; इच्छा रखने वाले से इच्छा-मुक्त होने का बदलाव।
जब कोई बदलने और त्याग करने के लिए तैयार होता है, तभी ध्यान सफल होता है।
जब सारी इच्छाएँ मिट जाती हैं, तो इंसान को पता चलता है कि संसार तो बस एक भ्रम था, और वह आधार या मैट्रिक्स जिसमें संसार का नाटक चल रहा था, वही सच है – एकमात्र सच।
तभी उसे परमानंद का अनुभव होता है; वह संसारी से संन्यासी बन जाता है।
संन्यास लिया नहीं जाता; संन्यास दिया नहीं जाता; यह घटित होता है।
No Question and Answers Available