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संन्यास न तो दिया जाता है और न ही लिया जाता है, संन्यास होता है
चूंकि अहंकार (Ego) मन द्वारा बनाया (कल्पना किया) गया है, इसलिए इसे हमेशा एक बेचैन और अशांत जीवन ही मिला है।
चूंकि यह असली नहीं है, इसलिए इसे बने रहने के लिए लगातार खुद को साबित करने की ज़रूरत होती है।
हर समय रिश्ते बनाना और उनकी ज़रूरत महसूस करना, ज़्यादा से ज़्यादा संपत्ति जमा करना, सोशल मीडिया पर ज़्यादा से ज़्यादा ‘लाइक्स’ की चाहत रखना, नाम और शोहरत के लिए संघर्ष करना, अलग-अलग संगठनों (खासकर धार्मिक) से जुड़ना – ये सब अहंकार के ज़िंदा रहने की दयनीय कोशिशें हैं।
चूंकि सभी अहंकारों को लगातार फैलने की ज़रूरत होती है, इसलिए दूसरे अहंकारों के साथ टकराव होना तय है, और सांसारिक जीवन में यह आम बात हो गई है।
समस्या संसार नहीं है; समस्या खुद अहंकार है।
अब समय आ गया है कि हम अपने भीतर झांकें, विश्लेषण करें और अहंकार के नकलीपन को समझें।
अगर दुनिया में कोई भी सच में ध्यान (meditation) करता है, तो हर किसी को एक ही जवाब मिलेगा – वह है भीतरी शांति, जो पूरी तरह से मौजूद और असली है, और नकली अहंकार से बिल्कुल अलग है।
[10:37 AM, 9/13/2026] श्रेणिक शाह: तब उन्हें एहसास होता है कि वे ही वह शांति (शांत चेतना) हैं, न कि वह उथल-पुथल वाला अहंकार।
शांति का कोई आयाम (dimension) नहीं होता, क्योंकि यह निराकार है (यह ‘नूमेनॉन’ या मूल तत्व है), जबकि अहंकार और उसका खेल का मैदान (संसार) चार-आयामी होते हैं (ऊंचाई, चौड़ाई, गहराई और समय) (जिन्हें ‘फेनोमेना’ या दृश्य जगत कहा जाता है)।
चार-आयामी संसार में कोई शांति नहीं है, क्योंकि अपनी आंतरिक ऊर्जा के कारण यह लगातार चलता रहता है; कोई भी चीज़ हमेशा के लिए नहीं रहती – न आपका नाम, शोहरत, संपत्ति, महल, किले और न ही आपके राज्य।
उस परम शांति को छोड़कर, भला कौन उस बेकार के संसार (मानसिक) में जाने की इच्छा रखेगा?
संन्यास न तो दिया जाता है और न ही लिया जाता है; संन्यास तो घटित होता है।
यह एक आंतरिक अवस्था है; इसे सिर्फ़ आप ही जान सकते हैं; कोई और नहीं जान सकता।
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