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वर्तमान
मन अतीत में ही रमा रहता है।
यह बस यही कर सकता है—जो ज्ञात है, उसी से निपटता रहता है।
सभी इच्छाएँ, भावनाएँ, पछतावे और मान्यताएँ—सब कुछ उसी पर आधारित हैं जो पहले ही घटित हो चुका है।
पहले कोई घटना घटती है, और उसके बाद ही मन उसके बारे में कोई विचार (और उससे जुड़ी भावनाएँ) गढ़ता है। हम इन्हें ‘यादें’ कहते हैं।
घटना घट जाती है, और मन बाद में अपनी ‘टीका-टिप्पणी’ जोड़ देता है, जिससे हमें उसकी ‘होशियारी’ पर यकीन होने लगता है।
फिर वह उसमें ‘मैं-पन’ (अहं) का भाव जोड़ देता है; जीवन की तमाम घटनाओं को आपस में पिरोकर, उन्हें एक काल्पनिक ‘मैं’ के इर्द-गिर्द घूमती किसी फ़िल्म जैसा बना देता है।
हर इंसान अपनी ही बनाई फ़िल्म में जीता है, और जब उसकी मृत्यु होती है, तो वह उस फ़िल्म को अपने साथ ही ले जाता है।
अवास्तविकता में जन्म लेना, और उसी अवास्तविकता में मृत्यु को प्राप्त होना।
वर्तमान—जहाँ मन का कोई अस्तित्व नहीं होता—ही एकमात्र वास्तविकता है; और हम उसी से चूक जाते हैं।
वर्तमान की उस परम शांति में ही स्थिर रहें; सुख-भोगों के पीछे कभी न भागें, बल्कि जीवन में जो कुछ भी सामने आए, उसी का आनंद लें।
जब विचारों का कोलाहल मचा होता है, तब सत्य के दर्शन नहीं हो पाते।
इंद्रिय-सुख हमारी अज्ञानता को और भी गहरा कर देते हैं। अतः, यदि मन में कोई लालसा या तृष्णा जागे, तो उसे पूरा न करें—भला इसमें क्या कठिनाई है?
– वसिष्ठ योग
मन ही हमें इस मुकाम तक—इस आध्यात्मिक पथ तक—ले आया है; जहाँ हम किसी उच्चतर सत्ता की, किसी ऐसी चीज़ की तलाश में हैं जो इस भौतिक जगत से परे हो।
मन पर ही निर्भर रहना, और साथ ही उससे ‘परे’ की तलाश करना—ये दोनों बातें एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं।
मन पर से अपना विश्वास हटाकर ही हम इस मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।
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