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चेतना ही जीवन है।
जब कोई इंसान मरता है, तो वह दो “चीज़ें” खो देता है।
वह होश (अवेयरनेस) खो देता है, और वह ज़िंदगी भी खो देता है (वह बढ़ना बंद कर देता है)।
इससे यह साबित होता है कि –
– होश ही ज़िंदगी है और
– ज़िंदगी होश में है।
(सब कुछ)।
हम सब एक साथ बंधे हुए हैं (चाहे हम इसे जानें या न जानें), होश (ज़िंदगी) के इस मीडियम में, और यह हर जगह है – हर जगह मौजूद है।
“मैं हर चीज़ में हूँ, और सब कुछ मुझमें है।”
– कृष्ण।
जब हमारा मन मैटेरियलिज़्म (मैं यह शरीर हूँ) से भर जाता है, तो हम उस ज़िंदगी को खो देते हैं जो दिखाई नहीं देती।
साधना विचारों (मैटर) को हटा देती है, और जो बचता है (बिना सोच वाली हालत) वही ज़िंदगी है।
जब ऐसा होता है, तो इंसान को एहसास होता है कि हर जगह सिर्फ़ ज़िंदगी है; कोई मौत नहीं है।
मृत्युर्मा अमृतमगमय। (मुझे मौत से ज़िंदगी की ओर ले चलो)।
रास्ता दिखाया जा सकता है, लेकिन सफ़र तुम्हारा है।
इस सबको घेरने वाली चेतना में हर चीज़ और हर कोई भी चेतना ही है, जो अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।
चेतना से बचने का कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि यह अनंत है।
जब कोई यह समझ जाता है, तो हर चीज़ और हर कोई भगवान बन जाता है।
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