No Video Available
No Audio Available
कर्तापन
हर काम करने का भाव सबसे पहले विचारों के रूप में शुरू होता है।
विचार भी ‘करने वाले’ होने का भाव ही हैं।
जब तक विचार बने रहते हैं, तब तक आप ‘कुछ न करने वाले’ (non-doer) नहीं बन पाते।
जागरूकता (awareness) आपका अंतिम पड़ाव नहीं है; असली पड़ाव ‘शून्य’ की अवस्था है, जहाँ न कोई विचार होता है, न कोई धारणा, न कोई मान्यता और न ही कुछ करने का इरादा; बस एक ऐसी अवस्था जिसमें देखने या साक्षी बनने की क्षमता तो होती है, लेकिन कुछ बदलने का कोई इरादा नहीं होता।
वहीं आपको आज़ादी का अनुभव होता है।
शून्यता में न तो कोई योजना होती है और न ही अतीत के कामों का कोई पछतावा।
इसमें मन नहीं होता; बस शुद्ध शांति और आनंद होता है।
मन बेचैनी है; शून्यता आराम है।
उस अवस्था में, सब कुछ अनंत का ही रूप बन जाता है और इसलिए पूरी तरह स्वीकार्य होता है।
शून्य अवस्था में रहने के लिए आपको कुछ सीखना नहीं पड़ता; बस मन की बातों को भुलाना (unlearn) होता है।
No Question and Answers Available