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एक फ़िल्म और पर्दा
ध्यान या साक्षी भाव, विचारों के पीछे जाने का ही एक अभ्यास है।
विचार एक चलती-फिरती फ़िल्म की तरह हैं, जिसकी हमें लत लग चुकी है।
विचार ऊपरी सतह पर होते हैं; वे चेतना के सागर पर तैरते रहते हैं।
विचार एक फ़िल्म हैं, और चेतना वह पर्दा है।
जिस पूरी तन्मयता से हम ‘मन’ नामक फ़िल्म को देख रहे हैं, उसी तन्मयता को हमें थोड़ा पीछे हटाकर उस पर्दे पर टिका देना है।
फ़िल्म तो एक उथल-पुथल है; जबकि पर्दा शांति है।
विचार हमें सीमित करते हैं; विचार-शून्यता हमारा विस्तार करती है।
विचारों के उठने से पहले, या उनके समाप्त होने के बाद—हर पल एक शाश्वत मौन मौजूद रहता है।
पीछे हटें, और स्वयं वह पर्दा बन जाएँ—मौन का पर्दा।
मन की फ़िल्म को चलते रहने दें; उसके साथ अपने ‘अहं’ (मैं-भाव) को न जोड़ें, और उस निर्मल, शाश्वत मौन का आनंद लें—जो ही परम सत्य है।
विचार यहीं हैं, इसी क्षण में—और मौन भी यहीं है।
फ़िल्म यहीं है—और पर्दा भी यहीं है।
ये दोनों एक-दूसरे से अविभाज्य हैं।
किंतु, पर्दे के बिना फ़िल्म नहीं चल सकती; जबकि पर्दा फ़िल्म के बिना भी रह सकता है।
इनमें से किसे चुनना है—इसके लिए बस अपनी दृष्टि या आयाम में एक छोटा-सा बदलाव करने की आवश्यकता है।
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