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मौन की समझदारी

जब मन हमारी अंदरूनी शांति में दखल देना बंद कर देता है, तो जो बचता है वह बिना किसी सोच-विचार वाली समझ (कॉस्मिक इंटेलिजेंस) होती है।
बौद्ध शिक्षाओं में, सोच-समझकर बोलने का सिद्धांत यह कहता है कि आपको तभी बोलना चाहिए जब आपके शब्द आपकी चुप्पी से ज़्यादा कीमती हों।
यह सोच ‘सही वाणी’ (Right Speech) का एक मुख्य हिस्सा है, जो ‘अष्टांगिक मार्ग’ (Eightfold Path) के चरणों में से एक है। यह ऐसी बातचीत को बढ़ावा देता है जो सच्ची, दयालु, काम की और सही समय पर हो।
जानबूझकर चुप रहने को खालीपन नहीं, बल्कि समझदारी का काम माना जाता है।
इससे आप बातों को गहराई से सुन पाते हैं और गपशप, अहंकार या फालतू की सफाई देने से अपनी अंदरूनी शांति को खत्म होने से बचा पाते हैं।
अभ्यास से ही आप चुप्पी की अहमियत को समझ सकते हैं।
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